15 साल बाद जब कॉलेज का प्यार सडक पर चाय बेचते मिली

सुबह का वक्त था। लखनव शहर की गोमती किनारे वाली सड़क पर भीर भाड के बीच सड़क किनारे एक छोटी सी चाय की दुकान थी। टीन की छट, लकडी की बेंचे और चूले पर उबलती हुई केतली से उठती भाप। उस दुकान में खड़ी थी मीरा। साधारन सी साड़ी में माथे पर बिंदी, चेहरे पर ठकान की हलकी लकीरें, लेकिन आखों में अजीब सी दिर्डता और साद्गी। उसके हाथ लगातार चल रहे थे। चाय बनाना, कुल्हड सजाना, ग्राहकों को चाय ठमाना। उसकी ठकी हुई उंगलियां मेहनत का बोज ढो रही थी। पर चेहरे पर आत्मसम्मान का भाव अभी जिन्दा था।

उसी समय सड़क पर एक चमचमाती काली स्यूवी रेड सिगनल पर आकर रुकी। गाड़ी के शीशे के पीछे बैठा था आदित्य। आज वह करोडपती बिजनस्मैन था। लाखों की गाड़ियों और करोडों के बिजनस का मालिक। पर उस वक्त उसकी आखें गहरी सोच में डूबी हुई थी। उसने अनजाने में बाहर देखा और नजर उस चाय की दुकान पर जाकर ठहर गई। जैसे ही उसकी आखें मीरा पर पड़ी उसका दिल जोरों से धड़क उठा। होट कांप गए और उसने अनजाने में बुदबुदाया। मीरा, सिगनल हरा हुआ तो बाकी गाड़ियां आगे बढ़ गई। लेकिन आदित्य ने ड्राइवर से कहा, गाड़ी यहीं साइट में लगाओ। ड्राइवर ने चौक कर पूछा, सर सब ठीक है। आदित्य ने धीमी आवाज में कहा, बस दो मिनट। गाड़ी किनारे लग गई और आदित्य उतरा। महंगे सूट और चमकते जूतों में उसकी पहचान साफ जलक रही थी। पर चेहरा तनाव और बेचैनी से भरा हुआ था। उसके कदम धीरे धीरे उस चाय की दुकान की ओर बढ़ रहे थे। जैसे वर्षों का बोज पैरों में पहला दारा हा बंद गया हो।

मीरा ने सिर उठाया। उसकी नजर सामने खड़े शक्स पर पड़ी। हाथ में पकड़ी चमच ठैर गई। आखें फैल गई। चेहरा सुन रह गया। पंधर वर्षों बाद सामने वही चेहरा था। वही आदित्य। होट कांप उठे और धीमे स्वर में उसके मूँसे निकला। आह आदित्य। आदित्य ने कुछ कदम और बढ़ाए। उसकी आँखों में वर्षों की जुदाई का सैलाब उमड पड़ा। हाँ मीरा। मैं ही हूँ। सोचा नहीं था। किसमत मुझे यहां ले आएगी। मीरा ने अपनी पलकों को जुकालिया। दिल कांप रहा था। पर आवाज को संभालते हुए बोली। चाय बना दूं। उसकी आवाज में वही साद्गी थी। लेकिन भीतर का दर्द साफ जलक रहा था। आदित्य ने सिर हिलाया। मीरा ने केतली से चाय निकाली और कुलहर में डाल कर उसके सामने रख दी। आदित्य ने कांपते हाथों से कुलहर थामा। जैसे ही पहला घूट गले से उतरा। उसके दिल में भूली बिसरी यादों का सैलाब उमड पड़ा। जहां उसकी और मीरा की कहानी ने पहली बार सांस ली थी। लखनव का डियवी कॉलेज बड़ा सा कैंपस। बड़े बड़े क्लास रूम। और जब नया सेशन शुरू हुआ था। भीड में ढेरों नए चेहरे थे। लेकिन आदित्या की नजर ठैर गई थी। सिर्फ एक पर मीरा पर। वह सफेद सलवार कुर्ते में। हाथों में किताबों का ढेर लिये। तेज तेज कदमों से क्लास की ओर भाग रही थी। माथे पर हलका पसीना और चेहरे पर मासूमियत। तभी अचानक उसकी किताबें जमीन पर बिखर गई। सब लोग आगे बढ़ते गए। कोई पलट कर रुका तक नहीं। आदित्या आगे जुका। किताबें उठाईं और मुस्कुरा कर कहा। ये आपकी हैं। मीरा ने नजर उठाई। उसकी आँखों में छिक थी। पर होंटों पर हलकी सी मुस्कान भी था। थेंक यू। बस उसी पल से आदित्या के दिल में कुछ नया अंकूर फूट गया। धीरे धीरे उनकी मुलाकाते बढ़ने लगी। कभी लाइबरेरी में, कभी गलियारे में, तो कभी कैंटीन में।

एक बार कैंटीन में मीरा अकेली बैठी थी। उसने चाय का कप उठाया तो देखा। बगल में आदित्या पहले से खड़ा था। कप खाली है। अगर बुरा ना मानो तो साथ बैठ सकता हूँ। आदित्या ने सहज भाव से कहा। मीरा ने सिर जुकालिया और होटों पर मुस्कान आ गई। उस दिन से दोनों अक्सर साथ चाय पीने लगे। मीरा पढ़ाई में अच्छी थी। पर मंच पर जाने से डरती थी। एक बार कॉलेज में डिबेट प्रतियोगिता हुई। उसका नाम लिखा गया। लेकिन मंच पर कदम रखते ही उसकी आवाज कांपने लगी। लोग हंसने लगे। तभी पीछे से आदित्या ने जोर से ताली बजाई और कहा। तुम बोल सकती हो मीरा। मुझे पता है तुम सबसे अच्छी हो। वो शब्द मीरा के लिए जैसे जादू बन गए। उसने कांपते होट खोले और धीरे धीरे बोलना शुरू किया। पूरी आउडियन्स खामोश हो गई। जब उसका भाषन खत्म हुआ तालियों की गरगराहट गूँज उठी। वह प्रतियोगिता जीत गई। मंच से उतरते समय उसने सबसे पहले आदित्य की तरफ देखा। उसकी आँखों में गर्व साफ छलक रहा था। उस नजर ने मीरा को पहली बार यह यकीन दिलाया कि कोई है जो उस पर भरोसा करता है।

दिन बीटते गए। अब उनकी बातें किताबों से निकल कर सपनों तक पहुँच गई थी। गोमती किनारे बैठना उनकी आदत बन गया था। मीरा अकसर पानी की लहरों में कंकर फेंकती और पूछती। आदित्य तुम्हारे सपने क्या है। आदित्य आस्मान कीतरफ देखता और कहता। सपने बड़े हैं। लेकिन अगर तुम साथ हो तो हर सपना पूरा कर लूँगा। मीरा मुस्कुरा कर चुप हो जाती। उसकी आँखों की चमक बहुत कुछ कह देती थी। धीरे धीरे ये दोस्ती महबबत में बदल गई। मगर दोनों ने कभी सीधे सीधे इजहार नहीं किया। वे सिर्फ आँखों से बातें करते, मुसकानों से एहसास जताते। बरगद की छाँव, क्लास की खिड़कियां और कैंटीन की चाय, हर जगह उनकी खामोश महबबत गूंजती थी।

लेकिन जिन्दगी हमेशा एकसी नहीं रहती। आदित्य का परिवार गरीब था। पिता ने साफ कह दिया। अब पढ़ाई छोड़ कर कमाने जा। घर चलाने के लिए पैसे चाहिए। आदित्य का दिल तूट। उसे पता था कि हालात के आगे वह बेबस है।

एक शाम गोमती किनारे जब सूरज ढल रहा था, उसने मीरा से कहा, अगर कभी मैं दूर चला जाओं, तो याद रखना, लोट कर जरूर आओंगा। मीरा की आँखें भराईं। उसने पहली बार उसका हाथ ठाम कर कहा, कभी मत कहना कि हमारी राहें अलग हो सकती हैं। मैं इंतजार करूंगी, चाहे जितना वक्त लगे। हवा भारी हो गई थी। गोमती की लहरे जैसे उनकी कस्मों को अपने साथ बहा ले गई।

पर किस्मत ने बेरहम मोड लिया। कुछ महीनों बाद मीरा की शादी गाउं में कर दी गई। आदित्य दूसरे शहर चला गया था। संघर्ष और सपनों की उस दुनिया में जहां रिष्टों की जगए जिम्मेदारियों ने ले ली थी। समय ने रफ़तार पकड़ी, देखते देखते पंद्रा साल बीद गए।

खैर, अब आदित्य की चाय खत्म हो चुकी थी। स्वाद जुबान से मिट गए थे और उसकी आँखों में नमी उतराई थी। उसने धीरे से नजरें उठाकर देखा। सामने वही मीरा थी, पर अब कॉलेज की लड़की नहीं, बल्कि सड़क किनारे चाय बेचती मस्बूत औरत। और तभी दुकान के भीतर से एक मासूम आवाज आई।

मा, आदित्य का दिल धक से रह गया। आदित्य उस मासूम आवाज को सुनकर जैसे पत्थर का हो गया। उसके कानों में मा शब्द बार-बार गूंज रहा था। धीरे-धीरे उसकी नजर दुकान के भीतर की ओर गई। वहां खड़ा था आठ नौ साल का एक बच्चा। दूबला, पतला शरीर, साफ लेकिन पुराने कपड़े, पीठ पर किताबों से भरा बैग। उसकी आँखों में मासूम चमक थी। चेहरे पर वही निष्चल मुस्कान जो कभी मीरा के चेहरे पर दिखा करती थी।

बच्चा दोड़कर मीरा के पास आया और उसका आचल पकड़ते हुए बोला। मा, स्कूल देर हो रही है, चलो ना। आदित्य की सांसें थम सी गई। उसने कामती आवाज में पूछा। मीरा, यह तुम्हारा बेटा है? मीरा ने चुपचाप बेटे के सिर पर हाथ फेरा और धीमी आवाज में बोली। हाँ, यही मेरी दुनिया है। उसकी आँखें नम्थीं लेकिन चेहरे पर आत्मसंमान की वही रेखा बनी हुई थी।

आदित्य की आँखों में बरसों की महबत, जुदाई और अब दर्द एक साथ उमडाए। वो कुछ पल चुप रहा, फिर धीमे स्वर में बोला। पर मीरा, तुम्हें यह सब अकेले क्यों जहिलना पड़ा? शादी तो हुई थी न? मीरा ने एक गहरी सांस ली। उसकी नजरें दूर सड़क की ओर चली गई। जैसे वहां उसे अपने जवाब मिल रहे हों।

हाँ, शादी हुई थी गाउं में। लेकिन पती शराब का आदी था। घर में मारपीट, अपमान और लानत ही मिली। मैंने बहुत सहा, सिर्फ अपने बच्चे के लिए। पर जब लगा कि अब उसकी मासूमियत भी उस जहर में डूब जाएगी, तब मैं सब छोड़कर शहर चली आई। दूसरी शादी का सहारा ले सकती थी। मगर मैं नहीं चाहती थी कि मेरा बच्चा सौतेलेपन की चोट खाए। इसलिए इस चूले को, इस धूएं को ही अपनी इजद बना लिया।

आदित्य का गला भराया। उसके होट कांपे, आखें लाल हो गई। मीरा, तुमने यह सब अकेले झेला और मैं कहीं और दुनिया जीतने में लगा रहा। मीरा ने उसकी ओर देखा। उसकी आखों में नशिकायत थी न इलजाम। बस एक ठकी हुई सच्चाई थी।

आदित्य, जिन्दगी हमेशा हमारी चाहतों के हिसाब से नहीं चलती। मैंने जो रास्ता चुना, वो सिर्फ अपने बेटे के लिए था। मुझे किसी से हमदर्दी नहीं चाहिए। मैं बस इतनी चाहती हूँ कि मेरा बच्चा पढ़े लिखे और कभी किसी के सामने हाथ न फैलाए।

बच्चा मासूमियत से आदित्य की ओर देख रहा था। वो कुछ समझ नहीं पा रहा था, पर उसकी आखों में अनकही उमीद थी। शायद उसे महसूस हो गया था कि यह अंकल उसकी माँ की आखों में आँसू ला रहा है और उसकी मुस्कान भी।

आदित्य जुक कर बच्चे के पास गया और उसके सिर पर हाथ फेरा। क्या नाम है तुम्हारा? आरव। बच्चे ने मासूम मुस्कान दी। मैं बड़ा होकर डॉक्टर बनूंगा ताकि मम्मी को कभी तकलीफ न हो। यह सुनकर आदित्य की आँखों से आँसू छलक पड़े। उसने मीरा की ओर देखा।

मीरा, मैं करोरों का मालिक हूं पर आज मुझे लग रहा है कि असली दौलत तुम्हारे पास है। यह बेटा जिसकी आँखों में सपने हैं और दिल में मा का भरोसा। मीरा चुप रही। उसके होठ कांपे लेकिन कुछ कहना पाई। कुछ देर का सन्नाटा छाया रहा। सड़क पर शोर था, गारियों की रफ़तार थी पर इस छोटे से चाय के ठेले पर खड़ा हर पल किसी अधूरी दास्तान की तरह भारी था।

आदित्य ने धीरे से कहा मीरा तुम्हें अकेले यह सब और नहीं सहना चाहिए। अगर तुम इजाज़तदो तो मैं तुम्हारे और आरव के लिए। वो रुख गया। उसकी आवाज में सच्चाई थी, पर मीरा की आँखों में शंका और डर, लेकिन आदित्य की आँखों में आँसू थे, आवाज कांप रही थी, पर दिल से निकली बात सच्चाई से भरी। थी। मीरा, बरसों से मैं सिर्फ दौलत और शोहरत कमाता रहा, पर आज मुझे एहसास हो रहा है कि मैंने असली जिन्दगी खो दी। अगर तुम इजाजत दो, तो मैं तुम्हारे और आरव के लिए सब कुछ बदल सकता हूँ। तुम अकेली क्यों लडो, मैं हूँ ना तुम्हारे साथ।

मीरा का दिल एक पल को धक से रह गया। बरसों पहले जिस आवाज को उसने अपने दिल में कैद कर लिया था, वही आवाज आज फिर उसके सामने खड़ी थी। उसकी आँखें भराईं, होंट कांपे, लेकिन उसने तुरंद खुद को संभाला। धीव से बोली, आदित्य, तुम्हारे शब्द मीठे हैं, पर जिन्दगी इतनी आसान नहीं है। मैं सिर्फ अपने लिए नहीं जी रही, मेरे बेटे के लिए जी रही हूँ, और उसके लिए मुझे डर है। अगर समाज ने सवाल उठाए, अगर उसने एक दिन मुझे से पूछा की, मम्मी आपने दोबारा क्यों शादी की, क्या तुम्हें यकीन है कि वह सौतेलेपन की छाया से बच पाएगा।

आदित्य ने तुरंत कहा, पर मैं तो उसका बाप बनना चाहता हूँ मीरा, दिल से अपनाना चाहता हूँ, उसे अपना बेटा कहकर दुनिया के सामने खड़ा करना चाहता हूँ, क्या यह सौतेला पन होगा। मीरा की आँखों से आँसू गिर पड़े, उसने कांपते स्वर में कहा, तुम्हारी नियत पर मुझे शब नहीं, पर दुनिया की नियत पर है। लोग मेरे बेटे को उंगलियों से दिखाएंगे, ताने देंगे, कहेंगे कि उसकी मा ने करोडपती से शादी कर ली, ताकि आराम पा सके। मैं अपने बेटे की नजरों में कभी गिरना नहीं चाहती, आदित्य, मैं चाहती हूँ कि वह अपनी मा को मजबूत देखे, चाहे तूटी हुई क्यों न हो।

आदित्य का दिल चीर गया, उसने आगे बढ़कर कहा, मीरा, क्या सचमुच तुम्हें लगता है कि मैं सिर्फ सहारा देना चाहता हूँ। नहीं, मैं तुम्हें वापस पाना चाहता हूँ। मैंने दौलत, शोहरत सब पा लिया, लेकिन जब रात को अकेला होता हूँ तो खालीपन मुझे खा जाता है। और आज जब तुम्हें देखा, तुम्हारे बेटे को देखा, मुझे लगा मेरी अधूरी दुनिया पूरी हो सकती है।

मीरा ने कांपते हाथ से आँसू पोचे, उसकी आँखों में वही पुराना प्यार जलक रहा था, लेकिन आवाज में कड़वाहट घुली हुई थी। आदित्य, तुम्हारी बात सुनकर दिल तो मान जाता है, पर दिमाग नहीं। मैंने समाज की चोटें खाई हैं, रिष्टों की गालियां सुनी हैं। मैं अपने बेटे को दोबारा उसी दलदल में नहीं जोंक सकती। अगर मुझे अपने आँसू पीने पड़े तो पी लूँगी, पर अपने बच्चे की हंसी पर कोई दाग नहीं लगने दूँगी.

कुछ पल दोनों खामोश खड़े रहे, सड़क का शोर, हॉर्न, भीड सब कुछ फीका पड़ गया था। जैसे दुनिया ने उनके लिए सांसें ठाम ली हों। आरव मां का आँचल पकड़े मासूमियत से देख रहा था। उसे समझ नहीं था कि ये दोनों बड़े लोग क्यों इतने भारी शब्द बोल रहे हैं। उसने धीरे से मां का हाथ खीचा। मम्मी स्कूल जाना है ना। मीरा ने उसकी ओर देखा और उसके बालों को सहलाया। फिर नजरें आदित्य की तरफ उठाईं।

तुम्हारी बातें मीठी हैं आदित्य, पर मेरा सच बहुत कड़वा है। शायद इस जनम में हमारी महबबत सिर्फ यादों में ही पूरी होगी। आदित्य की आँखें भीग गई। उसने कुछ कहना चाहा पर शब्द गले में ही अटक गए। उसके दिल पर भारी पत्थर जैसा बोज उतर आया। आदित्य कुछ देर तक चुप खड़ा रहा। उसकी आँखों में आँसू थे, लेकिन उनमें एक जिद भी छलक रही थी। उसने गहरी सांस ली और सीधे मीरा की आँखों में देखा।

अगर इस जनम में भी हमारी महबबत अधूरी रही, तो यह दुनिया जीते जी हमें मार देगी। तुम कहती हो समाज ताने देगा, तो मैं चाहता हूँ कि समाज के सामने ही तुम्हारा और आरव का हाथ थाम लूँ। ताकि कोई उंगली न उठे, बलकि सब को दिखे कि मैं तुम दोनों का अपनाया हूँ।

मीरा चौंग गई। आदित्य, यह इतना आसान नहीं है। आदित्य ने उसका हाथ पकड़ लिया। उसकी आवाज में ठहराव और सचाई थी। आसान मैं भी जानता हूँ नहीं है। लेकिन अगर हम डरते रहे तो कभी जी ही नहीं पाएंगे। मीरा, तुम्हारी आँखों में मैं वह सपना देखता हूँ, जिसे अधूरा छोड़कर मैं सालों तक भटकता रहा। आज जब किसमत ने हमें फिर मिलाया है, तो मैं पीछे नहीं हटूंगा। मैं तुम्हें और आरव को दुनिया के सामने अपनाऊंगा।

भीड में खड़े कुछ लोग उन्हें देख रहे थे। कोई फुसफुसा रहा था, कोई मुस्कुरा रहा था। मीरा का चहर शर्म और डर से लाल हो गया। लोग क्या सोचेंगे आदित्य। उसने धीमी आवाज में पूछा। आदित्य ने द्रड स्वर में कहा, लोग कल भी बोलते थे, आज भी बोलेंगे और कल भी बोलेंगे। लेकिन हमारी जिन्दगी उनकी सोच से नहीं चलेगी। मैं चाहता हूँ कि आरव कल जब बड़ा हो, तो गर्व से कह सके यह मेरे पापा हैं। और तुम कह सको हाँ यह मेरे पती हैं।

मीरा की आँखें भराईं। उसकी बर्सों की कस्में, डर और समाज की परवाह एक ही पल में तूटने लगी। उसने कांपते होठों से कहा, अगर तुम सच में इतना साहस रखते हो, तो मैं भी पीछे नहीं हटूंगी। पर याद रखना यह सिर्फ हमारी महबबत की नहीं, इजद की लड़ाई भीहोगी।

आदित्य ने हलकी मुस्कान दी और अपना हाथ आगे बढ़ाया। मैं तुम्हें वादा करता हूँ मीरा, अब कोई जुदाई नहीं होगी. मीरा ने कुछ पल हाँच.

मैं तुम्हें वादा करता हूं मीरा, अब कोई जुदाई नहीं होगी। मीरा ने कुछ पल हिचकिचाकर उसका हाथ थाम लिया। आरव मासूमियत से दोनों को देख रहा था। उसकी आखों में खुशी की चमक थी जैसे उसने बिना समझे ही सब कुछ समझ लिया हो।

सड़क किनारे खड़ी उस छोटी सी चाय की दुकान पर लोग ताली बजाने लगे। किसी ने कहा, सच में यह महबबत की जीत है। बरसों से बिछडे दो दिल फिर से मिल गए थे। और इस बार सिर्फ अपने लिए नहीं बलकि उस छोटे से मासूम के लिए भी जिसकी आखों में अब पूरा परिवार होने की चमक थी।

कभी-कभी जिन्दगी हमें दूसरा मौका देती है। लेकिन हिम्मत वही कर पाते हैं जो समाज की परवाह से उपर उठकर सच्चाई को अपनाते हैं। मीरा और आदित्य ने साबित कर दिया कि महबबत सिर्फ इजहार का नाम नहीं बलकि संघर्ष, सम्मान और जिम्मेदारी निभाने का नाम भी है.