अर्थी पर लेटी पत्नी की मांग भरते हुए रामदास बोला, इसका मंगलसूत्र कहाँ है? पहनाओ इसे। ससुर की आवाज सुनकर बहु भीतर से मंगलसूत्र लाई और मरी हुई सास को पहनादिया।
रामदास बोला, ये मंगलसूत्र इसकी चिता पर साथ जाएगा। कोई नहीं निकालेगा। सब चुप थे, मगर मन ही मन बहु बेटे कह रहे थे। बुढ़ा पगला गया है। दो भरी सोने का मंगलसूत्र मिट्टी हुए शरीर के साथ अगनी की भेंट करने को कह रहा है।
शमशान में पत्नी की चिता जल रही थी। दूर खड़ा रामदास आखों में आँसू भरे देख रहा था। मन ही मन कह रहा था, ले तुम्हारी आखरी इच्छा भी पूरी कर दी भागिवान। पूरे सोला श्रंगार के साथ विदा कर रहा हूँ। अब मुझसे कोई शिकायत मत करना। हाँ तेरे सुहागन जाने की जिद पूरी हो गई। मगर तेरे बिना मेरा क्या होगा। ये तुमने सोचा ही नहीं।
दास संसकार के बाद लोग बातें बना रहे थे:
कोई कह रहा था प्रेम हो तो ऐसा हो।
कोई कह रहा था बुढ़ा मुर्ख है।
दो लाक का सोना चिता में फूक दिया।
क्या रामदास मुर्ख था?